दूर पिटती ढोल की इस थाप पर,

कोपलें और पत्तियां 

भी बोलती हैं,

गात पर जलबिंदु 

जब उनके टपकता। 

बूंद के संहात से, 

फिर डोलतीं हैं,

जब मृदुल शीतल 

मधुर जल है बरसता।

नम्रता, माधुर्य, शीतलता, मीठे बोल, रसलता इस संसार में मनुष्यों को ही नहीं जड़, पेड़ पौधों, पशुओं को भी इसका अनुभव होता है और उन्हें भी यह अच्छा लगता है। जैसे ठंडी, मुलायम छुअन हमे भाती है वैसे ही वनस्पति जगत को भी प्रिय लगती है। 

स्फुरित हो 

कांप उठती 

देह इनकी,

मन मगन 

होकर नया 

संगीत गातीं।

पवन के संग 

मुस्कुराकर  

झूमती हैं ,

हो नतांगी 

वारि संग 

उत्सव मनातीं।

हर्ष, उल्लास, अनुभूति सभी जीवों और वनस्पति जगत के साथ जड़ जगत में भी समान रूप से संव्याप्त हैं। प्रसन्नता, संगीत गीत प्रियता, स्फुरन, अभिभूत होना सबमें समान ही होता है। खुशी से झुकना, अपना खयाल भूलना, आत्म विभोर होना भी सभी में एक जैसा ही होता है।

खिल उठे है 

अंग इनके 

इस छुअन से,

रंग धानी 

खिल उठा है 

इस मिलन से।

प्रिय स्पर्श, और अपनो का साथ या प्रिय मिलन सभी को अच्छा लगता है। वन लता हों या हम सभी अच्छे अनुभवों से मुस्करा कर खिल उठते हैं और सुंदर दिखते हैं। सौंदर्य प्रसन्नता का बाह्य रूप ही है।

बूंद पाहुंन 

आज आए है 

किधर से,

कोपलें चुप 

पूछती है पत्तियों से।

वर्ष भर की चाह का 

यह मिलन शीतल,

ग्रीष्म के अवसान का 

यह सुखद प्रतिफल।

शिशिर की उस दुखद 

पतझड़ से संभल कर,

हा! मिला मधुमास का 

यह मधुर इक क्षण।

जय प्रकाश मिश्र 

निश्चय ही जीवन की सार्थकता परिणामों से आंकी जाती है। और यह कठिन परिश्रम, संयम से ही मिलता है, जैसे गर्मी को झेल कर ही आम में मीठे फल लगते हैं। पर जीवन यापन में या जिंदगी को गुजारने में छोटे छोटे आनंद, प्रसन्नता, खुशियों को कमतर नहीं माना जा सकता, जैसे वर्षा से पेड़ों को या हमको भी परिणाम सी खुशी तो नहीं पर कुछ आनंद तो मिलता ही है। मेरा कथन है की जीवन का मार्ग और उद्देश्य दोनो ही प्रसन्नता पूर्ण होने चाहिए। इनका सामंजस्य उचित होना ही चाहिए।

2. केवल आपके लिए कविता

तुम नहीं मुझको सुनोगे 

जानता हूँ,

हैं पता तुमको, हमारे, 

राज सब।

पर अभी तक वो तुम्हारी 

निस्बतें,

मौन ही हों, 

हैं मेरे ही 

पास सब। 


दूर पिटती ढोल की 

इस थाप पर,

मन मेरा बिंधकर, क्या

सुनना चाहता है।


स्थिर खडी, मेरे 

उर की धड़कन 

को, यहां यह

आज, इतने 

पास से,

रात्रि के सुनसान 

पल में, 

क्या सुनाना चाहता है!

जय प्रकाश मिश्र

आपको सोचने के लिए छोड़ रहा हूं।











Comments

  1. Excellent poetry,softness of nature
    Is have to seen

    ReplyDelete
  2. आपके सुंदर मन और शीतल नयन दोनो को धन्यवाद।

    ReplyDelete

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