मानव ईश्वर की देवत्व प्राप्त उत्कृष्ट कृति,

पीर उठती है हृदय में क्या करूं 


हम आदमी.. हैं, चेतना हैं,

इसीलिए तो सोचते हैं।

मिथ्या है..! सब,

कभी कभी ये भी सोचते हैं।

जीवन को खूब गहराई में सोचें!  

..आखिर यह क्या होगा ?

काल सरिता में बहता 

एक सुरक्षित 

छोटा ‘स्लॉट’ ही होगा।

जाने दो, 

मत सोचो, 

ज्यादा! 

थोड़ा सोचो।

छोड़ो, 

काम भर सोचो, 

मन मत मसोसो। 


पर जीवन में 

कुछ तो, मिला ही है हमे, 

कुछ समय के लिए ही सही,

जो भी हो? मालिक हैं हम!

इतने समय के लिए ही सही।

न भी हों, पर

उसने 

कुछ 

दिया ही है, हमें 

एक चेतनामय शरीर, 

और ये बदलती जादुई दुनियां। 


हमारी चेतना यहां 

अपनापन पाती है

लगता है पहले से भी 

यहां आती जाती है।

वो सारी जगहें...

सुंदर है, आकर्षक है, 

स्वच्छ भी है, पर ध्यान दें!

बस वही जगह जो हमसे 

आज तक अछूती है।

जी हां, विश्सनीय है, 

भरोसे की भी है, अच्छी है

वहां तक ही 

जहां हमारा 

हस्तक्षेप नही है।


मानव ईश्वर की 

देवत्व प्राप्त 

उत्कृष्ट कृति,

अत्यंत श्रेष्ठ, 

विचारवान 

धारण किए धृति। 


बुद्धि, विवेक, ज्ञान, 

कौशल, सबसे संपन्न,

पास इसके धन, धरा, 

मणि मानिक,अन्न।

जय प्रकाश मिश्र

भाव: जीवन एक अनबूझ पहेली तो है पर परमात्मा ने हमें अपनी रहस्यमयी जादुई अद्भुत दुनियां भी इसके साथ बनाकर इसमें भेजा है। सबकुछ उसने सुंदर, आकर्षक, मनोरंजक, स्वादमय, आनंदमय बनाया है। हम अपनी आदतों से, अपने असंयम से इसे दूषित, विषाक्त कर रहे हैं। हमारी जीवन शैली बदलनी ही चाहिए।






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