बड़ी भूल हुई, सोचा मैने

सच कहूं तो, 

‘उसने’ 

बाजार-ए-जिंदगी को

शुरू में ही ना कह दिया,

बहुत बडा लक्ष्य तय किया, 

पक्के संकल्प से 

घर बार छोड दिया।


होता, क्या!

मिट्टी की काया 

मिट्टी की दुनियां में फिरी,

देखते ही देखते दुनियां ने 

भी दिखाई, अपनी जादूगरी। 


‘हिरन में कस्तूरी’ की बात 

आना था उसे, एक दिन 

"अपने ही पास,"

पर खोजता रहा, 

मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों 

में खूब लगाए कयास।

पहुंचे हुओं ने, उसे पहुंचाया था,

रास्ता अपनी समझ से 

अच्छा ही सुझाया था।


नतीजा! 

हां नतीजा निकला,

बहुत बिजी रहा…, 

पूरी जिंदगी, भागता, दौड़ता

पंडितों, मौलानाओं

तीर्थों, मजारों की

दिन रात बंदगी करता।


आखिर उसने सबकुछ 

क्यों छोड़ा था,

क्योंकि, उसने ठीक से पढ़ा था, 

अनंत का हिस्सा भी 

अनंत होता है

अनंत बन कर 'हिस्सा भी' 

अनंत के साथ खाता 

पीता, सोता और जीता है।


जाने न कितनी मिन्नतें,

मन्नतें, सजदे, तिलावत

नाम, जप, तप किए उसने, 

सारी जिंदगी ही गुजार दी 

मुफलिसी के दयार में उसने।


आखिर एक दिन, अचानक

मंजूर-ए-इबादत हुई, उसकी,

देखते ही देखते वो बन गया 

बड़ा मनसबदार, अपनी जमात का, 

अपने मठ का, उस दीनी मजार का।

जो उसका ख्वाब था।


हां अब

वह बड़ा था, 

'उन सबसे' ही नहीं; 

“उनसे” भी !

‘जिम्मेदारी थी’ 

उस पर 

‘उन सभी’ की ही नहीं

उन सभी के “अधीश्वरों की भी”।


उसे अहंकार हो गया,

उसके दायरे में लोग ही नहीं 

“वह भी” है, वो ही, उन्हें भी

घर, मकां, आराम, इज्जत

मुहैय्या कराता है,

वो न होता तो क्या होता !

आखिर “उनका यह मुकाम” कैसे बनता!


क्या रास्त्ता भटक गया, वह !

कौन कहता है? 

नहीं नहीं! 

वह बिल्कुल नहीं मानता!

जबकि वो है जानता, 

बेशक, 

वह वही कर था 

जो वह बिना घर छोड़े

अपने घर कर रहा होता,

अपने और अपनो के लिए।

यहां आकर वह दायरा थोड़ा

बड़ा तो जरूर हुआ

अपनो से आगे, 

अपनी जमात तक पहुंचा।

पर, मर्म तो मर्म ही होता है।

प्रेम, राग बन कर ही 

स्वाहा होता है।

चोरी तो चोरी ही होती है

छोटी हो या बड़ी 

सजा भी एक ही होती है।

उसने पढ़ा था,

अभी भूला भी नहीं था।


बैठे ही बैठे 

एक दिन, 

अपने पर, 

अपनी स्थिति पर

गौर किया, उसने।

अचानक वह सचमुच 

डर गया।

जाने क्या सोच कर!

अंदर ही अंदर पिघल गया।


मैंने पूछा क्या हुआ

बाबा जी! / पीर जी!

कुछ विचलित से लगते हैं,

रोने लगा, आंखे भर आईं। 

डबडबाई आंखें लिए

कहने लगा, 

‘बड़ी भूल हुई, मुझसे' 

सोचता हूं मैं, बोला।


जिसको सबकुछ मान कर, 

सबकुछ समर्पण कर 

निकला था, एक दिन!

जो पूरी दुनियां का रक्षक है, 

दाता है, विधाता है,

उसे कितना छोटा समझ लिया मैने, 

उसे कितनी छोटी जगह में  

बंद कर,

खुद को भी उसी में 

बंद कर 

लिया मैने।

'जो सबकी रक्षा करे'

उसकी रक्षा के अहंकार में मैने 

अपनी जिंदगी बिता दी।

मत पूछ, अब सोचता हूं ! 

मैने कितनी बड़ी खता की।

 

उसके लिए जो "सबकुछ है"

कितना छोटा सोचा, मैने

फिर भी वह ईश्वर हैं, दयालु हैं,

अब वह "यह जनता जनार्दन बन" 

मेरी रक्षा करें  ।

मेरी रक्षा करें ।

जय प्रकाश मिश्र

भाव: आज कल अनेक लोग सन्यासी बने घूम रहे हैं, ज्यादातर युवा ही हैं। दिन भर बाजारों में अब पैसे नहीं “दाल का दान” मांगते फिर रहे हैं। आत्म ज्ञान तो एकांत, ध्यान, सद्चर्चा, निग्रह, जनस्थान से विरक्ति में प्राप्य होता है। आत्म चिंतन, आत्ममंथन, अध्ययन, मनन से मिलता है।

लेकिन कुछ लोग जब सन्यासी से मठाधीश या अन्यान्य धर्मों के मान्य धर्मगुरु बन विपुल संपदा और आस्था के स्वामी बन जाते है तो अपने को प्रभु का, अल्ला का प्रमुख मान बैठते हैं। और मद में डूब चंदे इकठ्ठा कर उसके लिए घर, मस्जिद, मंदिर आदि बनाने में जिंदगी गुजार रहे हैं। 

अंत समय पर जरूर पछतावा होता होगा ऐसा मेरा मानना है। फिर समर्पण और क्षमा प्रार्थना ही बचती होगी। और सभी लोगों में वह परमेश्वर को अनुभव करता होगा।

जय प्रकाश मिश्र




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