ये कैसी बुनावट है बेहोश लताओं की,

हिल हिल के बुलाती है 

झुक झुक कर ये डाली।

मैं पास चला जाऊं 

मन मेरा उमंगता है।


लहरों सी मचलती है,

टहनी तेरी पतली यह

मैं इसमें समा जाऊं

तन मेरा हुलसता है।


क्या पास छिपा इसके

मुझे काश पता होता

सच कोई बता देता

वो मेरा सगा होता।


ये कैसी बुनावट है 

बेहोश लताओं की,

दिल ही हैं सिला करती

पर दर्द नहीं होता।


आंखों में डाल आंखे 

चुपचाप उतरती हैं,

आवाज हैं पी जाती

पलकें भी नहीं झुकती।


हैं हाथ मेरे खाली 

भर आया हूं भीतर से

क्या कुछ है मिल जाता

कुछ समझ नहीं पाता।


तेरे साथ जब मैं उड़ता  

कभी मन की घाटियों में,

फूलों की छुअन झूठी

बदली में समां जाता।


ये कैसा खुमार आया

मैं कितना खो गया हूं,

कुछ याद भी है तुझको

कभी एक ही थे हम तुम।


कुछ भी कहां यहां है 

मैं खुद में गुम हुआ हूं,

थोड़ी देर ठहर जाओ

मैं सच से मिल रहा हूं।


ये खींचता है मुझको

सागर को जैसे चंदा,

आगोश में भरने को

बेताब हो बस  कोई। 


तनती हुई ये लहरे

दिलकश कशिश से उठकर

आकाश को हैं छूती 

बाहों में हैं, भर लेती।


चंदा बहुत है ऊंचे 

क्यों दिल में धंसा जाता,

सागर में इतने नीचे

क्यूं अरमान पनपते है ।


सागर सा उमड़ आता

जब नजर तुम पे पड़ती,

हर डाली झूम जाती

सोचों में नाव तिरती।

क्रमशः आगे पढ़ें....

जय प्रकाश मिश्र



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