खोजते हैं हाथ मेरे पोर तेरी उंगलियों के,

दास्तान-ए-जिंदगी

खोजते हैं हाथ मेरे पोर 

तेरी उंगलियों के,

आज-जब, अब

.... हूं पड़ा, 

बिस्तर किसी..,

चुपचाप, तन्हा..!

है कौन मेरे पास है, 

उस....

मैं नहीं पहचानता।

एक परछाईं बची है

पास रहती है,

मेरे अब

घूमती है। 

पूछती है,

क्या तुम्हे कुछ चाहिए ?

"उठा दूं" बस

यही आवाज आती है।

एक समय आता है जब दुनियां सर पर नहीं पैरो के नीचे होती है, दौड़ खत्म, सभी संचय, प्रगति अर्थहीन। "थामले कोई हाथ मेरा, उठ पाऊं यहां से बदल लूं मैं एक करवट" इतनी चाहत रहती है। अपने पराए, पहचाने नहीं जाते, बस जो भी पास है उससे उम्मीद बचती है। अपने बच्चे के बचपन की कोमल उंगली की पोरों की याद कर उसे खोजता है।अपने बेटे-बेटी की यादों में वह अशक्त पिता डूब जाता है:

ठीक वैसे ही, 

कभी जब,

पकड़ लेता 

तूं कहीं पर,

राह चलते,

घूमते, 

बाहर निकलते,

हाथ मेरा।

.......

हाथ तेरा 

खोज लेता, 

उंगलियों को,

राह चलते, बीच में 

चुपचाप मेरी,

बात करते, 

कूदते, रोते

फुदकते।

जब यह वृद्ध जवां था उसका छोटा बच्चा चलते चलते, रोते, डरते अपने आप उसकी उंगलियों को पकड़ लेता था उसमे सामने के स्थिति से निपटने की शक्ति आ जाती थी।

दूर… कितना…आज 

मुझ से हो गये हो..,

सोचता……. हूं!

सच कहूं…, सुन,

पास मेरे…..,

आज ही हो तुम..

तुम्हारी याद… में, मैं…, 

आज इतना.. खो… गया हूं।

तब अपनी जवानी में बच्चे की उपस्थिति उतनी संवेदना से नहीं थी जितनी घनी आज उसकी अनुपस्थिति में यादें।

ढूंढता हूं, जानता हूं,

थी यहीं मेरी दवा…,

गिर गई ऐनक मेरी

किस ओर….

बैठा… सोचता हूं।

उठ नहीं पाता…

करूं क्या…

थक गया हूं..

तभी…

तेरी याद…. आती है,

गरम कितनी 

तेरी.. थीं, मुठ्ठियां…तब, 

अब याद आतीं हैं।

अब अपनी वर्तमान की खस्ता हाल बयां करता है अपनी रोजमर्रा की चीजे नहीं सम्हाले जाती। फिर भी अतीत में आज दूर रह रहे बेटे के बचपन में उसकी हाथो की गर्माहट दिमाग में घुमड़ती है।

गुजर जाएगी, 

जो भी उम्र, 

अब बाकी 

बची है।

नदी है, 

रुक नहीं सकती

सदा आगे बढ़ी है।

समय सरिता यथार्थ से अप्रतिहत प्रवाहित रहती है। 

अफसोस!

ज्यादा नहीं,

बस एक ही है, 

लेकिन रहेगा, 

मोड़ तक उस,

जहां हर ओर से 

आकर उजाला

हो रहा घुप।

जीवन संध्या जहां अंधेरे उजालों से नहीं डरते। मृत्यु ताक झांक करती है, आकलन लोग भीतर करते हैं।

लोग सगे ही थे, 

जिनसे भेदभाव हुआ,

नादानी में ही मैंने

अपना जीवन जिया।

कष्ट कष्ट ही होता है

किसी का भी हो,

चेतना एक हीं होती है

प्राणी कोई भी हो।

यही अमिट सत्य था।

जो अब मैं जान पाया।

अंत में सब लोग अपने ही हैं, जो काम आया वही सगा, यह ज्ञान हो ही जाता है पर दुनियां मजहब, जाति, वर्ग, ऊंच नीच में कैसी बंटी है अफसोस रह जाता है। दुखदर्द सभी का दूर होना चाहिए कोई कहीं हो, कोई भी हो पाता अपने दुःस्थिति से चल जाता है।

जय प्रकाश





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