लली मोरि श्री विग्रह की लाजि।
"लली" मोरि 'श्री विग्रह' की लाजि।
माधव रस जब इत उत छलकत,
करति नयन सौँ बाति।
लली मोरि श्री विग्रह की लाजि।
मोहन मूरति मुकुलित ह्वइ जब
हंसति अधर मुसुकाइ,
राधा तन निर्झर बन, झर झर,
भक्तन उर मिलि जात।
लली मोरि श्री विग्रह की लाजि।
"श्याम सुंदर" को अर्पण कर जब
तन मन सब कुछ जाऊं,
राधा नयन, बांवरे हंसि हंसि, अंसुअंन
टपकत पाऊं।
लली मोरि श्री विग्रह की लाजि।
भोरे माधव, राधा भोरी,
जमुना के तट चोरी चोरी,
बाल सखा संग विहरत वन वन
छुपि छु पि माखन खात।
लली मोरि श्री विग्रह की लाजि।
मिलि जुलि खेलत श्याम सखा सब
गइयन संग घूमत गिरि कानन
यमुना तट कूजत पंछी गन
श्याम नचत तरुवर के कुंजन
राधा वंशी लई चुराइ।
लली मोरि श्री विग्रह की लाजि।
जय प्रकाश
इस दृश्यमान प्रकृति के हर कण में हर क्षण “शाश्वत चेतन सत्य” उसी प्रकार संश्लिष्ट (अच्छी तरह जुड़ा हुआ) है, जैसे श्री राधाजी के दृश्यमान श्रीविग्रह में पुष्पाभूषणों, वस्त्रों, प्रत्येक अंगों, हृदय, मन, मानस और उनकी आभा के बीच श्रीहरि रसमाधव विद्यमान रहते हैं।
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