केतकी! के फूल यह, तेरे लिए!

मित्रों, एक सिंपल सी किताब है, 'वेदों की कथाएं' इसी में मुझे पड़ा मिला यह केतकी का फूल! सुगंध जाती ही नहीं इसकी मानस बोलूं या अंतर्मन से। इस लिए इसे आप को भी शब्दों में पिरो अग्रेषित करता हूँ,आप पढ़ सुगंध पाएं प्रसन्न हों यही चाहना है।

कौन थी यह केतकी? 
अनन्य.. सुंदर! 
एक न!  
था, 
योग्य.. इसके!  
वरण.. सम..!
मानती थी..केतकी,
हूँ...! 
अनन्यतम! 

सौंदर्य, गुण, आचार में,
वह अतुल्यतम! 
कहां.., 
कैसे? भा... गईं! 
इंद्र.. के, मन...! 
पर.. स्वर्ग को, दुत्कार कर..! 
देवेंद्र.. को भी, 
श्राप.. कर ! 
जटाधारी, आदि शिव, 
रक्षित..रही, 
अंत तक, यह.. केतकी... 
कौन थी  यह केतकी!   

यह.. दक्ष पुत्री!  
केतकी! 
अनुपमेया..!  अनुपमम्...
सौंदर्य..की ही.., 'डली' थी,
उस देह में वह.., रूपसी, 
उस काल मे, विशिष्टतम थी।

किसको चुनती?  
साथी नहीं, 
उन योग्य कोई! कहीं पर,
समय की उस परिधि ऊपर! 
इस लिए...
चिर! प्रतीक्षा...
शिव समर्पित! खुद ही हुईं।

केतकी तो सती थी, 
हिमालय की गोद में, 
समाधि ले, 
शिवशांति संग, स्थिर.. हुईं।

पार्वती! अर्धांगिनी, 
शिवांगनी!  
कहीं से तो, 
क्षुधित.. थीं... 
इन केतकी की, 
महक से, कुपित हो, 
अंदर कहीं, घायल हुईं।

और फिर क्या? 
परीक्षा?  
गाय बन, रंभाती.. वह पार्वती! 
पास.. ही, प्रस्तुत हुईं।
समाधि टूटी, 
केतकी.. की
सब 
देखकर!  
हतप्रभ! हुई...।
क्रोधित हुई, और पार्वती को
बहुत सारा, एक क्षण में कह.. गई।

पार्वती, तो पार्वती! 
अर्धनारी, रूप थीं, जाग्रत हुईं!
तूं रूपसी है! 
कोई नहीं है योग्य तेरे? 
विश्व... में! 
जा... 
अब एक न!  
पंचपति! एक संग 
हे केतकी अब तेरे होंगे! 
आज मेरे! श्राप से...!
तूं.. एक संग ही भोग उनको! 

रोने लगी, अब केतकी! 
क्या करे? 
आंसू! 
ढुलक कर, गिर पड़े,
नीचे.., खड़ी भागीरथी में, 
टप-टपाटप 
चू.. पड़े।

अरे! यह क्या? 
कमल बन वह अश्रुकण
स्वर्ण.. के, अप्रतिम! 
गंगा में प्रिय, अहा! हैं,
तिरने लगे...
पंक्ति सुंदर, दीप की हों, 
जलते... हुए,
चमचम चमकते दिवस में, दिखने लगे।

अग्नि दीपित!  प्रभा मंडित! 
सुवर्ण निर्मित! स्निग्ध! 
अनुपम! 
तिरते रहे, वे अश्रुकण बन
"स्वर्ण कमलम्" ! 
स्वच्छ निर्मल नीर 
ऊपर
भागीरथी के,
परा विस्तृत.. वक्ष पर! 
कुछ दूर तक...।

एक सुंदर, 
नेत्र..
उनमें आ फंसा, 
लालची! देवेंद्र.... का 
बस यहीं से भाग्य ने पलटा किया
उस केतकी का।

हस्तगत कर, अहा! इसको 
प्रफुल्लित! 
उस,
इंद्र.. ने,
राजरानी, शची... को, 
प्यार.. भर! 
एक ही वह स्वर्णकमल! 
स्नेह... से, अर्पित.. किया! 

मनोरथ हो पूर्ण, 
तृप्ति.. हो, 
संपूर्ण! 
देवता.. की, मनुज.. की! 
कहां! यह संभव कभी? 
और मुझको चाहिए! 
यह स्वर्ण कमलम् ! 
शची का आग्रह.. 
यही...।

इंद्र! थे यह दौड़ते.... 
भागीरथी के तटों पर,
मृग सरीखे प्यास लेकर... 
मिल जांय उनको, स्वर्ण कमल! 
प्रसन्न, प्रिय! उन शची... को,  
वह कर सकें, अर्पित करें।

किंतु यह क्या..
देखकर!  
उस केतकी को, भूल! जग..!  
सब...
आ... स्वर्ग.. तक! 
वे... खड़े हैं, देख कैसे मूढ़... से! 
कर रहे हैं याचना अब प्रेम की,
एक! भिखारी बन! 

केतकी... तो, केतकी... अब, 
अग्नि.. थी, जलती हुई..
श्राप से, तपती हुई! 
दुःखी थी,
निज भाग्य पर, अचंभित थी! 

देख कर इस हाल में 
उन इंद्र को, प्रणय याचक! 
रूप में, वह चकित थी, 
पर चाहना अंधी है होती,
एक तरफा,
लालसा वह, प्रणय की अब नग्न थी! 

एक तड़ित.. चमकी! 
बादलों.. से, गरजती! 
कौन हूँ मैं? 
जानते हो, 
रूप पर तुम भागते हो
मूर्ख हो? अग्नि हूँ जलती हुई
दूर जा! भूल जा! 
वह स्वर्ण कमलम!  
अश्रु मेरे! दहकते अंगार हैं, हृदय के।

पर वासना तो वासना! 
आगे बढ़ी, पग एक,
वह नृपराज थे,
अभय थे,
स्वर्गाधिपति अधिराज थे।

वह देख तूं! 
कौन है, बैठा हुआ, रक्षा में मेरे! 
भांप उसको! 
ताप! शिव का, यहां है, 
फैला हुआ, पहचान इसको..
इंद्र की आंखे खुलीं! 
वासना रहती कहां? 
दूर हो निज घर चली।

पार्वती 
सब देखती 
दूर से.. अचंभित थीं..
पास आ कहने लगी,
ऐ केतकी
द्वापर चढ़ेगा, और तूं! 
सखी होगी, 
विष्णु रूपी.. कृष्ण की,
द्रौपदी के रूप में,
श्राप मेरा, वरदान होगा,
अहा अब तेरे लिए,
सती, तूं.. तब भी रहेगी, 
पर, पांच पांडव, पती... तेरे,
एक संग... उस युग में होंगे,
धृतद्युम्न की पुत्री तूं! होगी ।

लोक के कल्याण की, 
जलती हुई तूं.... 
अग्नि.. होगी,
हुतासनी तूं...
महाभारत की अरी कारण बनेगी।

जय प्रकाश मिश्र






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