रस सुरीला, मुफलिसी का।
मित्रों, जीवन में संपत्ति बटोरते हमारा सारा समय निकल जाता है, मां पिता ने भी हमारे लिए इसे ही बटोरा और हम बच्चों के लिए वही बटोर रहे हैं। इतनी इसकी शायद जरूरत नहीं। इसी पर यह लाइनें आपको आपके प्रसन्नता की दृष्टि से प्रेषित हैं।
संपत्ति भी, क्या.. चीज है,
पीछे.., सभी.. हैं,
पीछे.., सभी.. हैं,
इसी.. के,
चाहते..
हैं..
बस..
अभी....,
मिल.. जाय!
हे प्रिय! प्रचुर.. उनको।
बस अभी मिल जाय..
असीमित! अपरिमित! संपत्ति सबको!
पर?
पूछ न!
क्या... जानते हैं?
संपत्ति क्या है?
किसलिए! यह चाहिए..?
हे.. मित्र ! उनको..?
एक....,
आदत.!.
हो... गई...
संपत्ति.... यह!
क्या कहूं! कैसे कहूं!
कितना बटोरूं! कैसे बटोरूं?
दानवी! पिशाच की,
यह चाह..
ही...
अब.... हो गई है।
इसी पर
एक...
कथानक.. है,
चाहता हूं, सुना दूं!
नागार्जुन एक भिक्षु थे;
दार्शनिक! विद्वान थे,
प्रसिद्ध.., थे,
निज राज्य में, पूजित.. बहुत थे।
कुछ.. नहीं था, पास.. उनके,
संपत्ति में वह, शून्य.. थे,
रानी... वहां की
सोचती थी!
कुछ करे,
कुछ..
उन्हें... , कैसे भी दे..दे ।
पर...?
उन्हें... कैसे... वो, दे...!
किस, रूप में, दे..!
बहुत! सोचा.. विचारा..
रास्ता तब एक निकाला..।
वस्त्र ही संपत्ति!
उनकी,
मात्र!
जो,
तन पर चढ़ी थी,
और भिक्षापात्र था!
'एक' वह भी..,
कुल! यही संपत्ति.. उनकी।
स्वर्ण का एक कटोरा,
थोड़ा बड़ा,
पात्र..!
भिक्षा... से भरा,
वह भेज दीं,
उपहार में, डरते हुए,
स्वीकार हो, उन भिक्षु को,
अति प्रेम से।
संपत्ति भी क्या... चीज है?
और वह भी स्वर्ण हो?
चोर पीछे लग गया,
उस कटोरे के
उसी क्षण!
से।
रात्रि में, वह आ गया,
भिक्षु! अंतस... पा गया!
स्वर्ण भिक्षापात्र,
देकर... प्रेम से
उपहार मेरा, अरे! यह...
परेशाँ
बिल्कुल न हो,
पकड़ इसको, आज से तेरे लिए।
पा गया,
वह स्वर्ण! खिल कर!
खुश... हुआ,
पर चोट भीतर खा गया!
कुछ नहीं है, पास
इनके..
देख.. ऐसे ?
कुछ सोच कर
दुखी मन! वह चुप! रहा,
जाने न क्या, वह सोचता?
घर.. आ गया।
उसी दिन!
पुराने, किसी... पाप में,
चोर, था पुराना! पकड़ा गया।
कटोरा तो, राजसी.. था,
अंकित! मुहर.. थी,
राज्य की..,
नागार्जुन..! भिक्षु के प्रति,
राज्य.. से वह दी गई
समर्पित..!
संपत्ति
थी,
कैसे... यहां!
यह..! प्रश्न... था ,
समस्या अति विकट थी।
पूछा गया,
जब.. भिक्षु से
सायास.. ही, वह सहज बोले...
उपहार है, यह!
मेरा दिया है
सच!
कटोरा... स्वर्ण का..
चोरी नहीं इसने किया।
चकित था, वह चोर!
उनको देखकर,
छूटकर,
जेल से... उनको.. मिला,
रोने.. लगा,
दुःख मुझे, उस दिन भी था।
दुख मुझे, प्रभु आज भी है,
आप का तो हाल!
प्रभु.. मुझसे..
भी, च्युत
है।
उस वक्त भी था.. आज भी है...!
पर सुखी हैं,
आप!
ऐसे... प्रसन्न मुख हैं !
क्या है, यह...
मुझको.. बताएं,
आदत मेरी,
संपत्ति की, मुझसे.. छुड़ाएं!
एक....,
आदत.!.
हो... गई...
संपत्ति.... यह!
मैं क्या कहूं! कैसे कहूं!
कितना बटोरूं! कैसे बटोरूं?
दानवी! पिशाच की,
चाह.. ही...यह .... हो गई है।
संपत्ति भी, क्या.. चीज है,
पीछे... सभी हैं,
इसी.. के,
चाहते..
हैं..
बस अभी,
मिल.. जाय मुझको
बस अभी मिल जाय.. मुझको!
कहने लगा...
इस लिए, अब छोड़ता हूँ,
कर्म यह!
मुझको बताएं,
संपदा! का मूल वह!
संपत्ति तो एक मरीचिका! है
पोटली भरती नहीं,
पोटली भर भी गई हो
आंख से
दिखती नहीं।
पा गया वह संपदा!
प्रसाद में,
उन संत से..
ध्यान.. की, प्रेम की, विश्वास की...
रस सुरीला,
मुफलिसी.. का,
आत्म भीतर बह रही,
संतोष की उस सुरसरी का...।
संगीत था, ओंकार... का,
गजब... बजता,
हृदय..
मन... में
मौन ही रे..!
अंतःश्रवण, दर्शन भी अंतः
कराता था, ध्यान!
प्रिय रे...
कर तो इसे तूं.. प्रेम से
फिर देख इसकी संपदा!
अतिशय अधिक रे।
तीन चीजें तुझी में हैं
बाहर नहीं रे...
शांति.. मन की, प्रेम.. उर का,
और वह आनंद!
रूपी संपदा...
हैं, छुपी,
अरे तेरी! तेरे अंतरों.... में ।
संपत्ति असली यही थी,
संपत्ति तो, असली.. यही थी।
जय प्रकाश मिश्र
(साभार जातक कथाएं)
नोट: नागार्जुन एक बौद्ध भिक्षु थे,
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